Monday, 26 January 2015

Its Very Easy to Keep Fooling Indians


क्या स्वतन्त्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस दासत्व के प्रतीक हैं ?
क्या भारतीयों को मूर्ख बनाना सबसे सरल है ?
26 जनवरी, गणतन्त्र दिवस – गुलामी का प्रतीक
15 अगस्त, स्वतन्त्रता दिवस – दासत्व की परम्परा



सुबह सुबह फेसबुक, Whatsapp और ट्विटर पर लोगों ने शुभकामनायें देनी आरम्भ कर दीं l

शुभकामनायें देखकर यूँ प्रतीत हुआ कि आखिर यह कब तक चलता रहेगा, भारत देश में भले ही लोग गाँधी-नेहरु का जन्मदिवस या पुन्य-तिथि मनाते हों परन्तु एक आश्चर्यजनक सत्य यह भी है कि यह सब दिखावा मात्र है, वास्तव में भारत के 90% लोग गाँधी-नेहरु को कोसते हुए ही मिलेंगे यदि आप उनसे मित्रतापूर्वक बात करेंगे तो l
ऐसा ही कुछ होता है 15 अगस्त यानी स्वतन्त्रता दिवस पर l

मैं ऐसी शुभकामनायें देने वाले मित्रों से कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ ? उत्तर भी साथ साथ दे रहा हूँ, किसी को संदेह हो तो स्वयं शोध के लिए स्वतंत्र है...

1. भारत की पहली संसद का निर्माण कब हुआ ?
उत्तर: 17 अप्रैल, 1952
2. भारत का संविधान कब पारित हुआ ?
उत्तर: 26 जनवरी, 1950
संविधान के अनुसार, भारत की संसद में निचले सदन यानी कि लोकसभा में संविधान का प्रारूप रखा जायेगा, उस पर बहस होगी, तदुपरांत पारित होगा, फिर वह ऊपरी सदन अर्थात राज्यसभा में जायेगा वहां बहस होगी, तदुपरांत वहां पारित होगा l
फिर राष्ट्रपति उस संविधान को पारित करेंगे l

परन्तु ऐसा तो कुछ हुआ ही नही, ब्रिटिश कानूनों के तहत पहले संविधान निर्माण किया गया और फिर प्रथम लोकसभा का गठन हुआ, लोकसभा और राज्यसभा कहीं भी इस संविधान पर चर्चा मात्र भी न हुई, और न ही यह कभी पारित ही हुआ l
मेरी समझ से बाहर है कि यह संविधान संवेधानिक है या असंवैधानिक ?

आपकी समझ में यदि कुछ आ जाए तो मुझे भी समझा देना ?


विषाद बढ़ता है ऐसी शुभकामनाएं देखकर कि आखिर कब तक हम भारतीय यह झूठे स्वतन्त्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस की शुभकामनायें एक दुसरे को देते रहेंगे, लगभग 3-4 पीढियां गुजर चुकीं परन्तु सत्य बोलने का साहस इस देश में न कोई कर रहा है और न ही सत्य पर से पर्दा ही उठाने का साहस कर रहा है l

कुछ वर्ष पूर्व एक महान साहसी आया, जिसका पुरुषार्थ मानो कई युगों से प्रेरित था, नाम था उसका राजीव दीक्षित, उसकी वाणी ने कुछ ऐसा प्रभाव डाला कि लाखों लोगों को उन्होंने गुलामी की मानसिकता और गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने हेतु सोचने पर मजबूर किया, लाखों लोगों को नींद से जगाने का भी कार्य किया l

परन्तु कुछ ऐसी शक्तियाँ भी हैं जो कि नहीं चाहतीं कि भारत के सोते हुए भारतीय जागें, वे चाहते हैं कि इन्हें जैसे सदियों से मूर्ख बनाया है ये ऐसे ही मूर्ख बने रहें l और ऐसी ही शक्तियों द्वारा उस महान पुरुषार्थी, बुद्धिजीवी, स्वदेशी और आयुर्वेद के प्रखर प्रवक्ता भाई राजीव दीक्षित जी के पुरुषार्थी जीवन का अंत कर दिया गया, संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई उस हत्या के तथ्य अभी खुलने बाकी हैं l

जो लोग ऐसा सोचते हैं कि भाई राजीव दीक्षित जी के स्वर्गीय हो जाने के बाद यह जागृत होने की परम्परा रुक जाएगी, तो मैं ऐसे सभी लोगों को बता दूं कि यह आग अब लग चुकी है, यह अब थमेगी नही l

एक शर्मनाक तथ्य को बताते हुए विषाद उत्पन्न होता है कि मथुरा में दो शूरवीर देशभक्तों द्वारा विक्टोरिया की मूर्ति तोड़ी गई तो उन दोनों शूरवीर देशभक्तों को मथुरा की पुलिस में जितने भी लोग थे लगभग उन सभी ने मारा, और इतने नृशंस तरीके से मारा कि आम आदमी उस पिटाई को देख नही सकता l

मथुरा के यह पुलिस वाले तो अपनी नौकरी और और पारिश्रमिक का कर्तव्य निभा रहे थे, ऐसा कर्तव्य 70 वर्ष पहले भी भारतीय पुलिस वाले निभा रहे थे, 150 वर्ष पहले भी, प्रथम विश्व युद्ध में भी, द्वितीय विश्व युद्ध में भी, और न जाने कब कब और कैसे कैसे भारतीय ही भारत के राष्ट्रभक्तों को अमानवीय रूप से अधार्मिक रूप से, राष्ट्रद्रोही रूप से ... परास्त करते आ रहे हैं l
फिर चाहे वो भारतीय सिकन्दर के साथ मिले हों, मेनिन्डर के साथ मिले हों, मुहम्मद बिन कासिम के साथ मिले हों, गौरी या गजनवी के साथ मिले हों, मुगलों और खिलजियों के साथ मिले हों... यह राष्ट्रद्रोह की परम्परा बहुत प्राचीन है... नई नही है l

बात करते हैं गुलामी अर्थात दासत्व के प्रतीक पर ...
स्वतन्त्रता दिवस या दासों की नई कहानी।

कौन सी स्वतन्त्रता
और गणतन्त्र ?
कैसी स्वतन्त्रता
और गणतन्त्र ?

15 अगस्त को प्रत्येक वर्ष मूर्ख हिंदू और मुसलमान उसी मानवता के संहार
का जश्न मनाते हैं, दोनों को लज्जा भी नहीं आती ।

युद्ध भूमि में भारत कभी नहीं हारालेकिन अपने ही जयचंदों से हारा है,
समझौतों से हारा है । अपनी मूर्खता से हारा है, उन्हीं समझौतों में सत्ता के हस्तांतरण का समझौता भी है ।

पाकिस्तान गाँधी की लाश पर बन रहा था, लेकिन इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट
1947 का न गाँधी ने विरोध किया और न जिन्ना ने ... न ही नेहरु ने और ही सरदार पटेल ने ।

सभी ने ब्रिटिश उपनिवेश यानी ब्रिटेन की दासता स्वीकार की, मुझे उन
मुसलमानों पर तरस आता है, जो कश्मीर को उपनिवेश इंडिया से उपनिवेश पाकिस्तान में मिलाने के लिए रक्त बहाते हैं, पाकिस्तान के लोगों को पहले यह सुनिश्चित करना चहिये कि क्या पाकिस्तान भारत का है ?
गंभीरता से शोध किया जाये तो उत्तर मिलेगा... नही?

क्यूंकि भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बंगलादेश आदि पर वास्तविक अधिकार तो रानी का है, आप कहेंगे कौन सी रानी, तो मैं आपको बता दूं ब्रिटेन की रानी l


भारत को छद्म स्वतन्त्रता देने का विचार तो 1942 में ही कर लिया गया था,
1948 तक का समय सुनिश्चित किया गया था ।


1947 के जून महीने में यह ज्ञात हुआ कि मुहम्मद अली जिन्ना (पुन्जामल ठक्कर का पोता) की टी.बी. की बीमारी अंतिम स्तर पर है और अधिक से अधिक 1 वर्ष की आयु शेष बची है ।

भारत की (छद्म) स्वतन्त्रता और भारत विभाजन की प्रक्रिया को तेज कर दिया गया ।

4 जुलाई 1947 से आरम्भ हुई यह प्रक्रिया 14 जुलाई को सम्पूर्ण हो गई और
मात्र 40 दिनों में ही यह प्रक्रिया समस्त षड्यंत्रों के तहत सम्पूर्ण हुई ।

गंधासुर गांधी ने कहा था कि विभाजन मेरी लाश पर होगा जिसे सुनकर वर्तमान
पाकिस्तानी पंजाब में रहने वाले हिन्दुओं में वर्तमान भारतीय क्षेत्रो में आकर बसने के निर्णय को बदल दिया । (Lovy Bhardwaj)

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बन गया और हिन्दू वहीं फंस गये ।

नरसंहार का एक ऐतिहासिक काल आरम्भ हुआ जिसके तहत...  35 लाख हिन्दुओं का नरसंहार किया गया ।

3 लाख हिन्दू नारियों का बलात्कार हुआ व जबरन धर्म परिवर्तन करके उन्हें
मुस्लिम बना दिया गया ।
3 करोड़ हिन्दू पाकिस्तान के जबड़े में फंसे रह गये ।

और इस भयानक नरसंहार के बीच किसी ने ध्यान ही नही दिया कि आखिर हुआ क्या ?

1946 के चुनावों के बाद जो सर्वदलीय संसद बनी उसमे विभाजन के प्रस्ताव को
पारित करने हेतु संयुक्त रूप से 157 वोट डाले समर्थन हेतु डाले गये जिसमे प्रमुख पार्टियाँ (कांग्रेस + मुस्लिम लीग + कम्यूनिस्ट पार्टी) थीं ।

पहला हाथ नेहरु ने उठाया था ।
 (Lovy Bhardwaj)

विरोध में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के 13 वोट पड़े और रामराज्य परिषद के
4 वोट पड़े ।

विभाजन का प्रस्ताव पारित हो गया ।

उसके बाद की समस्त प्रक्रिया दिल्ली में औरंगजेब रोड स्थित मुहम्मद अली
जिन्ना के घर पर ही सम्पूर्ण हुई ।

जिन्ना इतना धूर्त था कि जहाँ भू-तल पर नेहरु-गाँधी लार्ड माउंटबैटन के
साथ कानूनी सहमतियाँ बना रहे थे वहीं प्रथम तल पर जिन्ना अपनी कुछ सम्पत्तियां और औरंगजेब रोड पट स्थित वह घर बेचने की प्रक्रिया पूरी कर रहा था ।

मुहम्मद अली जिन्ना एक वकील था ।

नेहरु एक वकील था ।

गांधी एक वकील था ।

सरदार पटेल भी एक वकील था ।

उस समय के अधिकतर नेता वकील ही थे ।

वे सब जानते थे कि यह सम्पूर्ण स्वतन्त्रता नही अपितु स्वतन्त्रता है
मात्र कुछ वर्षों हेतु । (Lovy Bhardwaj)

जी हाँ...
यह छद्म स्वंत्रता ही थी ...इससे अधिक और कुछ नही ।

सत्ता का हस्तांतरण हुआ था ।
अर्थात सत्ता तो अंग्रेजों के पास ही रहेगी और उनकी देखरेख में शासन की
व्यवस्था सम्भालेंगे ... आत्मा से बिके हुए कुछ गिरे हुए भारतीय ।

यदि आधुनिक भाषा में कहूँ तो विश्व की सबसे प्रथम डील थी Business Process Outsourcing की स्थापना हुई  l

सत्ता के इस हस्तांतरण का साक्षी बना "Agreement of Transfer of Power"
जो कि लगभग 4000 पेजों में बनाया गया था और जिसे अगले 50 वर्षों हेतु सार्वजनिक न करने का नियम भी साथ में लागू किया गया ।

1997 में इस Agreement को सार्वजनिक होने से बचाने हेतु समय से पहले ही
तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री इंद्र कुमार गुजराल ने इसकी अवधि 22 वर्ष और बढा दी और यह 2019 तक पुन: सार्वजनिक होने से बच गया ।

ऐसे सत्ता के हस्तांतरण के Agreements ब्रिटिश सरकार के अधीन भारत समेत
समस्त 54 देशों के हैं जिनमे आस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलेंड, श्रीलंका, पाकिस्तान आदि 54 देश हैं ।

यह 54 देश ब्रिटिश राज के उपनिवेश कहलाते हैं ।

इन 54 देशों के नागरिक ब्रिटेन की रियाया हैं अर्थात ब्रिटेन के ही नागरिक हैं ।

इन 54 देशों के समूह को "राष्ट्र्मंडल" नाम से जाना जाता है जिसे आप
Common Wealth के नाम से भी जानते हैं अर्थात संयुक्त सम्पत्ति । संयुक्त सम्पत्ति किसकी ... ब्रिटेन की रानी की l
(Lovy Bhardwaj)

यदि आप सबको कोई आशंका हो तो उदाहरण के तौर पर आप यूं समझ लें कि ब्रिटेन
समेत सभी ब्रिटेन उपनिवेश "राष्ट्र्मंडल" देशों के भारत में विदेश मंत्री तथा राजदूत नही होते अपितु विदेश मामलों के मंत्री तथा उच्चायुक्त होते हैं और ठीक इसी प्रकार भारत के भी इन देशों में विदेश मामलों के मंत्री तथा उच्चायुक्त ही होते हैं ।

1. Minister of Foreign Affairs
2. High Commissioner

जैसे कि भारत की विदेश मंत्री हैं सुषमा स्वराज, तो यह सुषमा स्वराज का
अधिकारिक दर्जा विदेश मंत्री के तौर पर केवल रूस, जापान, चीन, फ़्रांस, जर्मनी, बेल्जियम आदि स्वतंत्र देशों में ही रहता है ।

परन्तु ब्रिटिश उपनिवेशिक अर्थात राष्ट्र्मंडल देशों जैसे आस्ट्रेलिया,
कनाडा आदि देशों में सुषमा स्वराज का अधिकारिक दर्जा Minister of Foreign Affairs का ही रहता है ।

आखिर भारत जैसे गुलाम देश की नागरिक क्वीन एलिज़ाबेथ की विदेश मंत्री कैसे
हो सकती है ... क्यूंकि यह कनाडा, आस्ट्रेलिया, भारत आदि देश तो क्वीन एलिज़ाबेथ के ही अधिकार क्षेत्र या मालिकाना क्षेत्र में ही आते हैं जिसे आजकल आप Territory के नाम से समझते हैं ।

इसी प्रकार उपनिवेशिक / राष्ट्र्मंडल देशों में भारत का कोई राजदूत
(Ambassador) नही होता अपितु मात्र उच्चायुक्त (High Commissioner) ही होता है । उपनिवेश देशों में उपनिवेश देशों का कोई भी राजदूत या दूतावास ही नही होगा, केवल उच्चायुक्त ही होंगे, आज तक किसी भी ब्रिटिश उपनिवेश देश में किसी भी ब्रिटिश उपनिवेश देश का अधिकृत रूप से कोई राजदूत नियुक्त नही हुआ और न ही कोई दूतावास ही बनाया गया है l
केवल उच्चायुक्त होते हैं l


Transfer of Power नामक इस Agreement की शर्तें लगभग 4000 पेजों में
विस्तार से लिखी गई हैं ।
( Lovy Bhardwaj)
जिसके कुछ अंश निम्नलिखित हैं:

1. गोरे हमारी ही भूमि 99 वर्ष के लिए हम भारतवासियों को ही किराए पर दे गए|

2. भारत का संविधान अभी भी ब्रिटेन के अधीन है|

3. ब्रिटिश नैशनैलीटी अधिनियम 1948 के अंतर्गत हर भारतीय, आस्ट्रेलियाई,
कनाडाई चाहे हिन्दू हो, मुसलमान हो, इसाई हो, बोद्ध हो, सिख ही क्यों न हो,  बर्तानियो की प्रजा है|

4.भारतीय संविधान के अनुच्छेदों 366, 371, 372 395 मे परिवर्तन की
क्षमता भारत की संसद तथा भारत के राष्ट्रपति के पास भी नहीं है |

4. गोपनीय समझौतों (जिनका खुलासा आज तक नहीं किया जाता) के तहत वार्षिक
अरबों रूपये पेंशन ।

5. इन्ही गोपनीय समझौतों के तहत ही वार्षिक रूप से
हजारों टन गौ मांस ब्रिटेन को दिया जाएगा|

[यही वह गोपनीयता है, जिसकी शपथ भारत के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री,
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, सभी राज्यों के मुख्य-मंत्री तथा अन्य समस्त मंत्री तथा प्रशासनिक अधिकारी लेते हैं... अत: उपरोक्त समस्त पदाधिकारी समस्त स्वतंत्र देशों की भाँती मात्र पद की शपथ नही लेते... अपितु 'पद एवं गोपनीयता' की शपथ लेते हैं ।]


6. अनुच्छेद 348 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय व संसद की कार्यवाही केवल
अंग्रेजी भाषा में ही होगी|

7. राष्ट्र्मंडल समूह के किसी भी देश पर भारत पहले हमला नही कर सकता ।

8. भारत किसी भी राष्ट्र्मंडल समूह के देश को जबरदस्ती अपनी सीमा में नही
मिला सकता ।

ऐसे बहुत से नियम एवं शर्तें सशर्त लिखित रूप से दर्ज हैं Trasfer of
Power नामक इस Agreement में ।



और यदि भविष्य में भारत किसी भी नियम या शर्त को भंग करता है तो...

1. भारत का संविधान तत्काल रूप से Null & Void हो जाएगा ।

2. छद्म स्वतन्त्रता भी छीन ली जाएगी ।

3. भारत में 1935 का Goverment of India Act लागू हो जायेगा तत्काल
प्रभाव से, जिसके आधार पर Indian Independence Act 1947 का निर्माण किया गया था ।

4. ब्रिटिश राज पुन: लागू हो जायेगा ... पूर्ण रूप से ।


Indian Independence Act 1947
www.legislation.gov.uk/ukpga/Geo6/10-11/30


British Nationality Act 1947
http://lawmin.nic.in/legislative/textofcentralacts/1947.pdf

British Nationality Act 1948
www.uniset.ca/naty/BNA1948.htm


1. आज कश्मीर पाकिस्तान को दे दो तो वो कश्मीर तब भी रहेगा तो ब्रिटेन की
ही Teritory में ... रानी का ही तो है कश्मीर।

2. आज सिखों को खालिस्तान दे दिया जाए तो वो भी रानी का ही रहेगा ।

3. पूरा पाकिस्तान, बर्मा, बंगलादेश, श्री लंका (Ceylon) भी रानी का ही है ।

4. भारत भी क्वीन एलिज़ाबेथ के अधीन ही है ।



कहना छोड़िये कि हम स्वंतंत्र हैं ।
बिना रक्त बहाए किसी को स्वतंत्रता नहीं मिली ।
( Lovy Bhardwaj)


आज भी वर्तमान संविधान के अनुच्छेद 147 के अनुसार यदि भारतीय संविधान में कोई परिवर्तन करना हो तो वो केवल Government of India Act - 1935 के आधार पर ही किया जा सकता है l

अब भविष्य में पुन: किसी गाँधी-नेहरु पर विश्वास न करना ।


उपरोक्त चित्र लिया गया है 2014 जुलाई महीने में हुए ग्लासगो राष्ट्र्मंडल के उद्घाटन समारोह से जहाँ सभी देशों के खिलाड़ी अपने देश का राष्ट्रिय ध्वज लेकर आ रहे थे, परन्तु उन देशों के खिलाड़ियों के समूहों के आगे आगे एक लडकी चल रही थी और उसके हाथ में जंजीर थी, जो कि एक कुत्ते के गले में बंधी थी और उस कुत्ते के ऊपर एक कपड़ा बंधा था जिस पर पीछे चल रहे खिलाड़ियों के समूह के देश का नाम लिखा हुआ था, ऐसा ही एक कुत्ता भारत देश के नाम से भी वहां सबके सामने चलाया गया था l

उपरोक्त प्रकरण देख कर मुझे तो बहुत दुःख हुआ, परन्तु अफ़सोस हुआ कि उस समय एक भी मीडिया चैनल में इसके विरुद्ध किसी प्रकार की चर्चा नही हुई l

न ही भारत सरकार द्वारा इस पर आपत्ति जताई गई l

आप कहेंगे पता नही क्यों नही हुई ?
परन्तु मुझे ज्ञात है क्यों नही हुई ?

यदि किसी को यह चित्र भी नकली या Fabricated लगता हो तो इसी कार्यक्रम का विडिओ YouTube पर उपलब्ध है वह प्रत्यक्ष देख सकता है, इस विडिओ में 40वें मिनट पर आप प्रत्यक्ष देख सकते हैं l

https://www.youtube.com/watch?v=ZlYwNqixTig




आज वसुदेव बलवंत फडके, वीर सावरकर, नथुराम गोडसे व आप्टे, डाक्टर मुंजे, चन्द्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह आर्य, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, रोशनसिंह, मदनलाल ढींगरा आदि देशभक्त क्यों पैदा होने बंद हो गये...?

क्यूंकि भारत की जनता को छद्म स्वतन्त्रता और गाँधी-नेहरु आदि की झूठी
कहानियाँ सुना सुना कर खोखला कर दिया गया है ।

उपरोक्त सभी शूरवीर देशभक्तों के नाम आज आप नही जानते यदि उन्हें किसी ने बताया न होता कि वे गुलाम देश के नागरिक हैं, और ब्रिटिश राज ने भारत को गुलाम बनाया हुआ है l
(Lovy Bhardwaj)


आज लगभग वही स्थिति आ खड़ी हुई है, आज भी पैदा होते हैं चन्द्रशेखर और रामप्रसाद बिस्मिल परन्तु आज उन्हें कोई बताता ही नही है कि वे गुलाम हैं l
नई पीढ़ी अपने करीयर और मौज-मस्ती को लेकर आत्म-मुग्ध है ।

हाथों में झूलते बीयर के गिलास और होठों पर सुलगती सिगरेट के धुएं में
उड़ता पराक्रम और शौर्य की विरासत नष्ट सी होती दिखाई प्रतीत हो रही है ।

आज चाणक्य भी आ जाएँ तो निस्संदेह उसे भी सम्पूर्ण भारत देश में एक भी
योग्य वीर्यवान सा पराक्रमी न प्राप्त होगा । ( Lovy Bhardwaj)

लाखों करोड़ों युवाओं के रूप में कभी यह राष्ट्र "ब्रह्मचर्य की शक्ति" के
रूप में समस्त विश्व में प्रसिद्ध था और आज विडम्बना देखो कि उसी देश के वीर्यवान अपने बल-बुद्धि-प्रज्ञा समान वीर्य को युवावस्था में ही नष्ट कर डालते हैं ।

डाक्टर-इंजीनीयर-वैज्ञानिक तो सब घर के बाथरूम में ही बहा दिए जाते
(वीर्य-नष्ट कर कर) हैं... तो बचे खुचे निकलेंगे तो क्लर्क ही ... वही क्लर्क जो Lord McCauley चाहता था ।

लगता है कि जैसे McCauley अपने लक्ष्य को पाकर जीत चुका है ।
( Lovy Bhardwaj)



सब उन्हें सिखाते हैं ... I Proud To Be An Indian...
जिसका वास्तविक अर्थ होता है ... I Proud To Be A British Indian.

मेरी जानकारी के अनुसार विश्व की सबसे पहली BPO की डील 15, अगस्त 1947 को हुई थी l
(Business Process Outsourcing)

और भारत का संविधान संवेधानिक रूप से न तो कभी भारत की लोकसभा में रखा गया और न ही उस पर बहस हुई और न ही वह पारित हुआ l

श्री लंका और बंगलादेश जैसे छोटे छोटे देशों की ने भी संविधान समीक्षा समिति बनाई और उस पर चर्चा कर के क्रमश: दो और तीन बार अपने संविधान को निरस्त किया, तथा जब तक कि वो उनके देश की बहुसंख्यक जनता की परम्पराओं, धर्म, सभ्यता, संस्कृति के अनुसार नही बन गया तब तक पारित नही हुई l

भारत जैसे देश में 3 बार संविधान समीक्षा समिति बनाई जाती है...
परन्तु ... तीनो ही बार संविधान समीक्षा समिति ही भंग हो जाती है... संविधान नही l

सेना आप की रक्षक है

भारत में सेना का मनोबल तोड़ने के लिए१९४७ से ही षड्यंत्र जारी है
1947 में भारतीय सेना पाकिस्तानियों को पराजित कर रही थी, सेना वापस बुला ली गई । 
सैनिक हथियार बनाने और परेड करने के स्थान पर जूते बनाने लगे । परिणाम 1962 में चीन के हाथों पराजय के रूप में आया। 1965 में जीती हुई धरती के साथ हम प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को गवां बैठे| 1971 में पाकिस्तान के 93 हजार युद्ध बंदी छोड़ दिए गए लेकिन भारत के लगभग 54 सैनिक वापस नहीं लिये गए| एलिजाबेथ के लिए इतना कुछ करने के बाद इंदिरा और राजीव दोनों मारे गए|


पाकपिता गंधासुर गाँधी को पहचानने में माननीय प्रधानमंत्री नमो सहित सारे
इंडियन आज भी भूल कर रहे हैं ।

आप सबसे विनम्र निवेदन है कि संगठित हों और एकजुट होकर अपने धर्म तथा इस
राष्ट्र की रक्षा करें ... बचा लीजिये इस नष्ट होते सनातन वैदिक धर्म तथा आर्यों की इस पवित्र भूमि स्वरूप इस राष्ट्र को ।

हम परतंत्र क्यों रहें ?
हम ब्रिटेन के नागरिक क्यों बने रहें ?
हम ब्रिटेन के गुलाम क्यों बने रहें ?

राष्ट्र्मंडल का विरोध करो ।
सत्ता के हस्तांतरण के अनुबंध का विरोध करो ।

क्वीन एलिज़ाबेथ की दासता का विरोध करो ।

क्या आप में आर्यत्व ... जीवित है ?
क्या आप आर्यावर्त नाम से प्रसिद्ध इस भारत भूमि को दासता की बेडियों से
मुक्त कर सकते हैं ?

क्या आप वीर सावरकर, वसुदेव बलवंत फडके, चन्द्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद
बिस्मिल आदि का अवतार बन सकते हैं ?


सीमाएं उसी राष्ट्र की विकसित और सुरक्षित रहेंगी ...
...जो सदैव संघर्षरत रहेंगे l

जो लड़ना ही भूल जाएँ वो न स्वयं सुरक्षित रहेंगे न ही अपने राष्ट्र को
सुरक्षित बना पाएंगे l

जय श्री राम कृष्ण परशुराम




Wednesday, 18 December 2013

Misuse of Diplomats & Chessmen like Devyani for Image Cleaning Politics

Article Published in 2 Languages - English & Hindi

Devyani and Her Family- Becoming a Victim of Politicization of Big Issues.

I am surprised by the maelstrom over the arrest and harassment of Indian Deputy general consul and the tough stance taken by the Indian government over this matter. It’s important to note that New Delhi did not retaliate in such an aggressive manner even in 1971 Indo-Pak war, when Washington deployed its combat ships near the Indian borders.

This strong reaction by the Indian govt. is certainly applaud-able, according to me, this reaction raises many questions, as taught by our great Ancient Ethicist and Politician Chanakya:

'' Extra Formality Must Be Seen With Suspicion."

'' The Wicked Use Their Intellect for Committing Sins Only."

Even though every proud Indian must be happy with the stand taken by the govt. on this matter, however, nobody would have expected the govt. to react in this Macho manner,

Because in the last 10 years Indian government has only disappointed the public sentiment, regardless of the issue.

The uncivilized and indecent behavior done to Indian diplomat Devyani khobragde by the united states, it raises many questions, such as :
1. Is u.s.a unaware of the courtesy protocol for foreign diplomats?
2. Is u.s.a least bothered about getting its image polluted?
3. Why would a country like u.s.a behave in such fashion?
4. Was u.s.a not aware about the gravity of this matter ( harassing a foreign diplomat)?
5. Did u.s.a not analyzed the opposition over this matter by other countries?
6. How can u.s.a make such a mistake in Diplomats related affairs ?

If we are to contemplate over the questions raised by the above suspicions, what illuminates in mind is how big leaders use- misuse their pawns to create issues and manipulate them for self image cleaning. Some issues are even crafted and imposed to distract the public from hot news topics that can hamper their image.

So, was it done at the directions given by the congress, to its corporate buddy united states, to improve the image of government in the India? Weak leadership and political failures had thrown the Congress the back foot due to which congress was in need of some issues and controversies which can help improve the image of present government in the minds of Indian public.

That image, which has maligned due to rampant corruption, inflation and congress politicians who are  always surrounded by allegations and also due to loosing in recent provincial elections. This image was further contaminated by congress politicians and its allies who did sharp commentaries about the poor policies of Congress.

In the past 10 years, the kind of strategies that were used by Indian government, in cases of harassment of Indian civilians, merchants and soldiers by china, Pakistan, Italy, Sri Lanka, Bangladesh and other countries, were very weak and lame in contrast to how it reacted against America in the case of Devyani.

Specially, Somalian pirates continue to loot our merchants and ships; however, New Delhi hardly showed any interest. In u.s and China, some Indian civilians and merchants were trapped in fake cases, When government was asked for help, it did nothing but offered a canful of false promises.

After a thorough contemplation of these issues, it concludes that when officers and pawns are manipulated for the bigger benefits of their lords (Read politicians) what kind of grave effects it has on the life of those pawns and their families? In that phase of troubles and strong criticism, how many people support or make distance with them?

Indian Deputy General Consul Devyani khobragde is a daughter of a former I.A.S. officer, While studying for exams of administrative and foreign services, Devyani would have never thought about such a misery to ever happen with her, especially when she was posted in U.S, at such an esteemed designation.

However, still this Indian diplomat was misused as a pawn, after which the kind of insult she had to suffer on a global level, for that, even if American and Indian governments ask for apologies in writing, it will never be able to repay the grave physical and mental torture that Devyani had to go through.

The way Devyani was handcuffed and arrested in front of her daughter’s school and then her daughter and house maid were also arrested, most indecent, uncivilized and undignified behavior that can’t be properly explained in words, is when she was made to be naked for frisking, after which she was kept in the lock up of males, most of whom were in lock up due to drug abuse, is absolutely against the protocol for a foreign diplomat.

Whatever your reactions may be after reading this article, however, my conclusion is Devyani is trapped at the directions of Indian government, for using it as a medium to white wash its ever deteriorating image, for the May 2014 elections.




बड़े मुद्दों की राजनीती में देवयानी जैसे पिसते अफसर और उनका परिवार 
l

अमेरिका में नियुक्त भारतीय उप महावाणिज्य दूत देवयानी खोब्रागड़े की गिरफ्तारी और बदसलूकी से उठे विवाद के बाद भारत सरकार द्वारा जो ठोस एवं तीखी प्रतिक्रिया की गई उससे मैं आश्चर्यचकित हूँ, इस प्रकार की कड़ी प्रतिक्रिया तो भारत ने 1971 में भारत – पाकिस्तान युद्ध के समय तब भी नहीं की थी जब अमेरिका ने भारतीय सीमा के पास तक अपने जंगी बड़ों की तैनाती कर दी थी l


भारत सरकार की यह ठोस और कड़ी प्रतिक्रिया निश्चित ही प्रशंसनीय है मेरे अनुसार यह प्रतिक्रिया ऐसे बहुत से प्रश्न भी खड़े करती है, जैसा कि महान नीतिकार चाणक्य ने भी कई शिक्षाएं हमें दी हैं:-

“अधिक औपचारिकता में शंका करनी चाहिए - Extra Formality Must Be Seen With Suspicion."
“नीच व्यक्ति बुद्धि का प्रयोग भी पापकर्मों के लिए ही करते हैं - The Wicked Use Their Intellect for Committing Sins Only."

अमेरिका द्वारा भारतीय दूत के साथ बदसलूकी की गई उसकी जो प्रतिक्रिया भारत सरकार द्वारा की गई वो निश्चित ही प्रशंसनीय है, परन्तु इस प्रकार की प्रतिक्रिया की अपेक्षा समस्त भारत में संभवत: किसी भी भारतीय ने नही की होगी, क्यूंकि पिछले 10 वर्षों की भारत सरकार ने लगभग लगभग सभी मामलों में भारतीय जन-भावनाओं को निराश ही किया है, चाहे वह कोई भी विषय क्यों न रहा हो l

भारतीय दूत देवयानी खोब्रागड़े के साथ अमेरिका द्वारा जो भी अमर्यादित और असभ्य व्यवहार किया गया उससे निश्चित ही कई प्रकार के प्रश्न खड़े होते हैं :-
1         क्या अमेरिका दूतों के साथ होने वाले शिष्टाचार की नीतियों से परिचित नहीं हैं ?
2         क्या अमेरिका को अपनी छवि के दूषित होने का कोई भी नहीं ?
3         क्या अमेरिका ने विश्व के अन्य देशों द्वारा होने वाले विरोध का आकलन नहीं किया ?
4         आखिर अमेरिका जैसा देश इस प्रकार का व्यवहार क्यों करेगा ?  
5         क्या अमेरिका को इस मामले कि गंभीरता का अनुमान नहीं था ? 
6         आखिर अमेरिका इस प्रकार की राजनयिक मामलों की भूल कैसे कर सकता है ? 

यदि उपरोक्त शंकाओं से उत्पन्न प्रश्नों पर विचार किया जाए तो निश्चित ही यह ज्ञात होगा कि बड़े नेताओं द्वारा किस प्रकार अपने मोहरों का उपयोग-दुरूपयोग विवादों को जन्म देने और उन विवादों से छवि सुधारने के कार्यों हेतु किया जाता है ? कुछ विवाद ऐसे भी उत्पन्न किये जाते रहे हैं जिनसे कि पूर्व में चल रहे गर्मागर्म विवादों से जनता का ध्यान हट रहा l

क्या कांग्रेस के इशारे पर इस प्रकार का कार्य अमेरिका द्वारा किया गया जिससे कि कांग्रेस को अपनी छवि बदलने का अवसर प्राप्त हो सके l कमजोर नेतृत्व और राजनैतिक विफलताओं ने कांग्रेस को कई मामलों पर बैकफुट पर धकेल दिया था जिसे लेकर कांग्रेस को कुछ ऐसे मुद्दों और विवादों की आवश्यकता उत्पन्न हुई कि जिससे भारतीय जनता में कांग्रेस और भारत सरकार की छवि बदलने का प्रयास किया जा सके l  
वो छवि जो लगातार भ्रष्टाचार, महंगाई, वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के आरोपों में घिरे रहने के बाद कई राज्यों में चुनाव हारे जाने के बाद और भी ख़राब हुई है, उस छवि को और भी विद्रूप उन तीव्र और तीखी आलोचनाओं ने भी किया जो कि स्वयं कांग्रेसी नेताओं और सहयोगी दलों के नेताओं द्वारा की गईं थीं कांग्रेसी नीतियों के बारे में l 

पिछले 10 वर्षों में भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, श्री लंका, इटली आदि देशों द्वारा भारतीय नागरिकों और सैनिकों के साथ जिस प्रकार के हथकंडे अपनाए गए, उनको लेकर जिस प्रकार की नीति भारत सरकार ने अपनाई वो अमेरिका के प्रति अपनाई गई प्रतिक्रियाओं से कहीं निम्न स्तर की प्रतिक्रियाएं थीं l विशेषकर सोमालियाई लुटेरों द्वारा जो भारतीय नागरिकों और जहाजों का अपहरण किया जाता रहा उसके प्रति भी भारत सरकार की नीति सदैव निराशाजनक ही रही l अमेरिका, चीन आदि देशों में कुछ भारतियों नागरिकों और छोटे उद्योगपतियों को भी झूठे मुकद्दमों में फंसाया गया, इन मुकद्दमों में जब भारत सरकार से सहायता मांगी गई तो भारत सरकार न सदैव कंधे उठा कर निराश करने या झूठे आश्वासन देने के सिवाय और कुछ न किया l

सभी बातों पर गंभीरता से विचार करने के बाद यह निष्कर्ष भी निकलता है कि छोटे अफसरों या मोहरों को जब अपने हित साधने हेतु उनका दुरूपयोग किया जाता है तो उन मोहरों के जीवन और उनसे सम्बन्धित उनके परिवार, रिश्तेदार और अन्य सम्बन्धित लोगों के जीवन पर क्या क्या असर पड़ता है ? विपत्तियों और आलोचनाओं के उस बुरे दौर में कितने लोग उनके साथ जुड़ते हैं, कितने लोग उनसे दूरी बना लेते हैं ?


भारतीय उप महावाणिज्य दूत देवयानी खोब्रागड़े एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी की ही सुपुत्री हैं, प्रशासनिक एवं विदेश सेवाओं की परीक्षाओं हेतु पढाई करते हुए संभव ही कभी देवयानी ने सोचा होगा कि उसके साथ कभी ऐसा भी हो सकता है, विशेषत: जब वो अमेरिका में एक इतने बड़े पद पर कार्यरत हो चुकी थीं l
परन्तु उसके बाद भी जब भारतीय दूत देवयानी को मोहरे की भांति दुरूपयोग किया गया उसके बाद वैश्विक स्तर पर जो अपमान देवयानी का हुआ है उसके लिए भले ही भारत और अमेरिका की सरकारें लिखित में भी क्षमा मांग लें परन्तु देवयानी का जो शारीरिक अपमान हुआ उसकी भरपाई किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया या लिखित क्षमा-याचना नहीं कर सकती l
जिस प्रकार से देवयानी को उसकी सुपुत्री के विद्यालय के बाहर से हथकड़ी लगा कर गिरफ्तार किया गया, उसके बाद उसकी बेटी और नौकरानी को भी गिरफ्तार किया गया l सबसे अभद्र, असभ्य, अमर्यादित व्यवहार तो किसी भी रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता जिसमे देवयानी को निर्वस्त्र करके उसकी तलाशी लेने का प्रकरण सामने आता है और उसके बाद उसे दूत की मर्यादा के विरुद्ध पुरुषों के लॉक-उप में रखा जाता है जिसमे अधिकतर नशाखोरी में गिरफ्तार थे l

यह लेख पढने के बाद आप सबकी जो भी प्रतिक्रिया हो परन्तु मेरा निष्कर्ष यही है कि देवयानी को भारत सरकार के इशारे पर ही फंसाया गया है, जिसके माध्यम से भारत सरकार अपनी छवि को साफ़ सुथरी बना सके, मई 2014 में होने वाले चुनावों की तैयारी हेतु l




Thursday, 12 December 2013

The War has been Intellectual


आज घोड़े पर चढ़कर कोई तलवार आपकी गर्दन पर लगा कर हिन्दुओं का धर्मांतरण नहीं करवा रहा, लोकतंत्र और धर्म-निरपेक्षता की आड़ में सैकड़ों प्रकार के प्रपंच आज धर्मांतरण हेतु प्रयोग किये किये जा रहे हैं, जिन्हें हिन्दुओं का अधिकाँश वर्ग समझ नहीं पा रहा l

और जो समझ भी पा रहे हैं उनमें भी अधिकाँश वर्ग ऐसा है जो समझता सब कुछ है परन्तु कर कुछ नहीं प् रहा l

वर्तमान में स्थिति ऐसी हो चुकी है कि अधिकाँश हिन्दुओं को टेलीविजन, रेडिओ, फिल्मो के माध्यम से उल्टी सीधी बातें, किस्से, डायलाग आदि  सुना सुना कर उन्हें हिन्दू धर्म के विरुद्ध करने का प्रयास किया जाता है और वो दुनिया का सबसे Soft Target बनता है, क्यूंकि उसके पास न तो अपनी धार्मिक मान्यताओं का उपहास उड़ाने वालों के लिए कोई उत्तर है न ही तोड़...

ऐसे हिन्दू अपने धर्म, संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं का उपहास उड़ते हुए देखते हैं... परन्तु कर कुछ नहीं पाते, ये उपहास उड़ाने वालों को उचित Reply ही नहीं दे पाते, Counter करना तो बहुत दूर की बात है ... Because... The War has been Intellectual

मेरी इस पोस्ट से कोई यह निष्कर्ष न निकाल बैठे कि मैं भक्ति उपासकों या भक्ति सम्प्रदायों का निंदक या आलोचक हो गया हूँ, ऐसा नहीं है, यह स्पष्टीकरण इसलिए आवश्यक है कि FaceBook पर कई लोग ऐसे भी होते हैं जिनका मूल स्वभाव आज भी Orkut के चिरकुट वाला ही रहता है, बिना सोचे समझे Comment करना उनका स्वभाव बन चुका है, ऐसे लोग कृपया इस Post से दूर रहें, यदि कुछ समझ में आये तो अपने सुझाव दें, अन्यथा उचित दूरी बनाए रखें आपकी अति कृपा होगी l

भक्ति काल ने सनातन धर्म को इस्लामिक आक्रमणों के कारण हो रही हानियों से बचाने हेतु एक प्रकार से संजीवनी का कार्य किया, जो कि सराहनीय था, है और रहेगा l
वर्तमान शिक्षा पद्धति में धर्म, अध्यात्म आदि की शिक्षा किसी विद्यालय में तो मिलती नहीं, अपितु थोड़ी बहुत शिक्षा जो घर पर या मन्दिर में मिलती है वो भक्ति की और ही प्रेरित कर देती है, परन्तु यदि अब क्या सारा जीवन भक्ति भक्ति भक्ति ... और केवल भक्ति ?

ये तो कुछ ऐसा हुआ मानो... आपने 10वीं कक्षा पास कर ली है, परन्तु फिर भी हर साल 10वीं की ही पुस्तकें पढ़ रहे हो, और 10वीं की ही परीक्षा की तैयारी हो रही हो ... यह कब तक चलेगा l
वैसे तो आजकल के पढ़े लिखे SICKULAR लोग धर्म को एक फालतू की चीज समझते हैं, और जो लोग धर्म को अपने जीवन में महत्व देते भी हैं वे मन्दिर जाकर आरती और कीर्तन करने को ही धर्म समझ लेने की गलती करते रहते हैं, परमात्मा को प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं होती, पर केवल भजन कीर्तन को ही धर्म समझ लेना गीता का अपमान स्वरूप है,

वेदों में तथा गीता में मुक्ति के तीन मार्ग बतलाये गए हैं...
१. ज्ञान मार्ग ... २. कर्म मार्ग ... ३. उपासना मार्ग ...

क्यों हमारे धार्मिक लोग केवल कीर्तन की ढोलकी बजाने को ही धर्म समझ लेते हैं, क्या उनको जाकिर नाईक जैसे लोग दिखाई नही देते, जाकिर नाईक ने अपने Pisslam के पैशाचिक ग्रन्थ पढ़े हैं और साथ ही उसने वैदिक ग्रन्थों का भी अध्ययन किया है पर यह और बात है कि जिसकी सनातन धर्म में आस्था ही न हो वो वेदों का अध्ययन कर भी लेगा तो उनकी व्याख्या तो मैक्स-मुलेर के रूप में ही करेगा... नास्तिक व्यक्ति या फिर वेदों में आस्था न रखने वाले व्यक्ति यदि वेदों का अध्ययन कर भी लेंगे तो वे अर्थ का अनर्थ ही करेंगे ...
और जाकिर नाईक अकेला नहीं है, मैक्स मुलर ने भी वेदों का अध्ययन किया और सत्यानाश किया, अर्थ का अनर्थ किया, आप सब लोग ठंडे दिमाग से सोचिये, क्या जाकिर नाईक और मैक्स मुलर जैसे लोगों को उत्तर देने के लायक बना जा सकता है .... कीर्तन आदि करके या ढोलकी आदि बजा कर के ...???

आखिर क्यों धार्मिक लोग शास्त्र-अध्ययन नहीं करते, धार्मिक लोग ही नही करेंगे तो फिर कौन करेगा ...??

यही समस्या है... और इस समस्या को जाकिर नाईक तथा फादर डोमिनिक जैसे लोग भली भांति पहचानते हैं ... कि हिन्दू या तो सो रहा है.... और जो जाग रहा है वो बस ढोलकी बजा रहा है, या कीर्तन आदि कर रहा है ....
उनके ग्रन्थों का सत्यानाश करने का अच्छा अवसर है ...?

फिर तैरा कर दिखाओ पानी में लकड़ी का क्रास ... और सूरत के प्लेग के रोगियों को पिलाओ दवाई वाला पानी .. Holy-Water कह कर... और करो धर्मांतरण ... क्योंकि उनके कुतर्कों का उत्तर देने हेतु तो कोई आपको प्रशिक्षित करने वाला है नहीं ... न ही आपको कोई सिखाने वाला है कि उचित मार्ग क्या है .... ??

भक्ति काल एक प्रकार का आपातकाल था जो कि अब गुजर चुका है, अब पुन: वापिस अपने ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग की और लौटने की है ... परन्तु पूरे विश्व को केवल भक्ति भक्ति की और ही प्रेरित करते रहना क्या यह मुर्खता की पराकाष्ठा जैसी प्रतीत नही होती l

एक वो समय था जब आक्रमणकारी घोड़ों पर बैठ कर आते थे और सनातन धर्म को भांति भांति प्रकार से हानियाँ पहुंचाने के प्रयास करते रहते थे, उस समय ज्ञान, पराक्रम, भक्ति, सहनशीलता, कूटनीति के तहत जितना जितना जिसका सामर्थ्य हुआ ...उसने वो बचा लिया l

आज के समय में युद्ध बोद्धिक हो चुका है, अवैदिक मत और वेद-विरोधी मत दोनों वैदिक धर्म की ईंट से ईंट बजाने हेतु आये दिन कोई न कोई नये प्रकार का प्रपंच चलाये रहते हैं, जिनमे रूपये के लालच में बिके हुए अहिंदुओं का भी उल्लेख आवश्यक है, जैसे सतलोक आश्रम का कबीर-पंथी गुरु रामलाल जो पिछले दिनों जाकिर नाईक से पैसा खाकर हिन्दू विश्वास को चोट पहुंचाने के लक्ष्य में असफल हो हुआ, जिसमे कि एक बहुत बड़ा हाथ है पंडित महेंद्र पाल आर्य जी का l

आज यदि कुल मिलाकर देखा जाए तो पंडित महेंद्र पाल आर्य जैसे लोग ही बहुत कम मिलेंगे आपको जो सनातन धर्म के शत्रुओं को उनके कुतर्कों का वैदिक धर्म के वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर उन्हें हरा सकें l
क्या सारा जीवन कीर्तन करने वाला प्राणी कभी जाकिर नाईक के कुचक्रों का उत्तर दे सकता है ?
वर्तमान में जाकिर नाईक जैसे लोगों के पास अपना TV Channel भी है, और अरब देशों से जो वित्तीय सहायता प्राप्त होती है वो भी किसी से छुपी हुई नही है l

अब जाकिर नाईक के रिसर्च सेंटर में हजारों मुस्लमानों की भर्ती की जा रही है, जो कि जाकिर नाईक के कुचक्रों को लोगों के बीच फैलाने का कार्य सड़क पर उतर कर करने वाले हैं, मन्दिर में कीर्तन, हवन आदि करने वालों को वे दिग-भ्रमित करने उतरने वाले हैं l
ये सब होगा आने वाले कानून “अंध-श्रद्धा निर्मूलन कानून” के अंतर्गत ...

अब अखिल भारत हिन्दू युवक सभा द्वारा ऐसे “वैदिक - ज्ञानोदय” कार्यक्रम के माध्यम से युवकों को चुन चुन कर तैयार किया जायेगा...
जिसमे वैदिक ज्ञान, वैदिक मत, वैदिक सिद्धांत, वैदिक साहित्यों, दर्शनों, समस्त श्रुतियों-स्मृतियों आदि का ज्ञान दिया जायेगा, उसके उपरान्त समस्त अवैदिक और वेद-विरोधी पुस्तकों का भी तुलनात्मक अध्ययन करवाया जायेगा l

अंत में मुख्य रूप से इसमें सभी युवकों को गैर-हिन्दुओं के शुद्धि-करण की विधि भी सिखाई जाएगी, जिसके माध्यम से किसी भी पैशाचिक सम्प्रदाय के अंतर्गत पैशाचिक जीवन जीने वाले किसी भी अहिंदू को आप कभी भी – कहीं भी शुद्धिकरण करके एक विशुद्ध मनुष्य जीवन जीने का अवसर प्रदान कर सकते हैं l

अज्ञानता के चलते हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल पाते ना ही आकलन कर पाते हैं कि क्या सही है और क्या गलत ...
सही अर्थों में कहा जाए तो जिस व्यक्ति को धर्म-सत्य-नीति का वास्तविक ज्ञान ही न हो, वो अधर्म असत्य अनीति का विरोध किस प्रकार कर पायेगा ?

इस पवित्र कार्य में सहयोगी बनने वाले समस्त सनातनी भाइयों का हार्दिक स्वागत है, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक कार्यक्रमों में सक्रीय रूप से भाग लेकर जाकिर नाईक जैसे लोगों के कुचक्रों से सनातन धर्मियों को बचाने हेतु आगे आयें l


हिन्दू महासभा प्रचंड हो, भारत देश अखंड हो

ॐ सर्वोपरि सर्वगुण संपन्न सनातन धर्मं

|| सनातनधर्मः महत्मो विश्व्धर्मः ||

..."विश्व महाशक्ति बनना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और हम इस पद को लेकर रहेंगे ।"

जय श्री राम कृष्ण परशुराम ॐ